Story Of Panchatantra in Hindi With Moral / पंचतंत्र की कहानियां इन हिंदी

Story Of Panchatantra in Hindi With Moral / पंचतंत्र की कहानियां इन हिंदी

Story Of Panchatantra in Hindi मित्रों इस पोस्ट में Story Of Panchtantra in Hindi दी गयी है।  सभी Story Of Panchatantra in Hindi Language बहुत ही बढियाँ है।

 

 

 

Story Of Panchatantra in Hindi ( पंचतंत्र की कहानी हिंदी ) 

 

 

 

 

 

किसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। लोमड़ी अपनी चालाकी और मक्कारी के लिए जानी जाती है। लोमड़ी के पास एक मच्छर भन-भना रहा था।

 

 

 

 

मच्छर कह रहा था, “हर कोई अपने को इस जंगल का राजा समझता है और हमेशा हुक्म चलाता रहता है। आज से मैं किसी का भी हुक्म नहीं मानूंगा, आज से मैं इस जंगल का राजा हूँ। किसी जानवर में दम नहीं है जो मुझे हरा सके।”

 

 

 

 

मच्छर की बात को सुनकर लोमड़ी को गुस्सा आ गया और वह आग बबूला होते हुए मच्छर से बोली, “तुम अपनी औकात में रहो मच्छर, तुम सभी जानवरों को चुनौती दे रहे हो।”

 

 

 

Story Of Panchatantra in Hindi

 

 

 

मच्छर ने लोमड़ी को डांटते हुए कहा, “मैं इस जंगल का राजा हूँ, मैं जो हुक्म दूंगा वह मानना पड़ेगा, नहीं मानने पर हमारे साथ युद्ध करना पड़ेगा।”

 

 

 

 

 

लोमड़ी ने मच्छर से कहा, “चलो इसी वक्त फैसला कर लेते है। अगर मैं हार गयी तो तुम्हारा हुक्म मानूंगी अन्यथा तुम्हे मेरी गुलामी स्वीकार करनी पड़ेगी।”

 

 

 

 

 

 

मच्छर और लोमड़ी के मध्य लड़ाई शुरू हो गयी थी। मच्छर हर तरफ से लोमड़ी पर वार कर रहा था। लोमड़ी वार करना तो दूर की बात वह अपना बचाव भी नही कर पायी और अपने पंजे के द्वारा ही घायल हो गयी।

 

 

 

पंचतंत्र की कहानी हिंदी में 

 

 

 

 

मच्छर इस बार लोमड़ी के नाक पर बैठा और अपना डंक मारा। लोमड़ी ने मच्छर को पकड़ने के लिए अपना पंजा अपने मुंह पर दे मारा, जिससे उसके चेहरे का आकार ही बदल गया, और वह निढाल होकर एक तरफ गिर गयी।

 

 

 

 

 

 

 

 

मच्छर ने लोमड़ी से पूछा, “क्या तुम अपनी हार मानती हो या और लड़ना है ?”

 

 

 

 

 

लोमड़ी ने मच्छर से कहा, “मैं अपनी हार मानती हूँ और तुम इस जंगल के राजा हो।”

 

 

 

 

यह बात फैलते हुए शेर के पास पहुंची जो इस जंगल का वास्तविक राजा था। शेर ने अपने मंत्री चीता से पूछा, “क्या करना चाहिए ?”

 

 

 

 

 

मंत्री चीता ने राजा शेर से कहा, “महाराज, इस समय हमें मच्छर से समझौता कर लेना चाहिए। उसके बाद उसे युक्ति लगाकर ठिकाने लगाना चाहिए।”

 

 

 

 

 

“समझौता शब्द हमारे शब्दकोश में ही नहीं है। मैं उस मच्छर से मुकाबला करूँगा।” शेर ने गरजते हुए कहा तो चीते की बोलती ही बंद हो गयी। शेर ने पुनः चीते से कहा, “जाओ उस मच्छर से हमारे मुकाबले का एलान कर दो।”

 

 

 

 

दूसरे दिन शेर और मच्छर में मुकाबला आरम्भ हुआ। मैदान में सारे जंगली पशु और पक्षी इस मुकाबले को देखने के लिए उपस्थित थे। पहला वार शेर की तरफ से हुआ।

 

 

 

 

मच्छर ने अपना बचाव करते हुए पलट वार शेर की पीठ पर किया और वहां से उड़ गया। शेर ने मच्छर को पकड़ने के लिए अपनी पीठ पर पंजा मारा। मच्छर तो नहीं मरा लेकिन शेर अपने ही पंजे से घायल हो गया।

 

 

 

 

 

 

शेर के कान के पास जाकर मच्छर ने कहा, “मजा आया महाराज”। शेर ने पुनः पंजा मारा और शेर का कान लहूलुहान हो गया। यही क्रम कई बार चला, जिसके परिणाम स्वरूप शेर घायल होकर पस्त हो चुका था।

 

 

 

 

 

अबकी बार मच्छर ने शेर के मुंह पर धावा बोल दिया। शेर ने मच्छर को पकड़ने के लिए पंजा मारा और उसका ही मुंह घायल हो गया। शेर पस्त होकर एक तरफ निढाल हो गया।

 

 

 

 

 

मच्छर मुकाबला जीत चुका था और खुद को जंगल का राजा घोषित कर दिया। धीरे-धीरे यह बात आग की तरह फ़ैल गयी, सभी जीव जंतु मच्छर को अपना राजा मानने लगे।

 

 

 

 

 

 

 

लेकिन जिस तरह सुबह के बाद दोपहर और दोपहर के बाद शाम होती है, उसी तरह मच्छर के समय की शाम हो चुकी थी। अपने जाले में बैठी मकड़ी ने झींगुर से कहा, “हमारे रहते हुए मच्छर कैसे राजा हो सकता है ? जाओ मच्छर से कह दो हमसे दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाय या तो राजा का पद त्याग कर दे।”

 

 

 

 

 

 

 

झींगुर ने मच्छर को यह बात बताई तो मच्छर घबरा गया। लेकिन राजा था इसलिए मकड़ी से मुकाबले की हामी भर दी। जंगल के सारे पशु-पक्षी इस मुकाबले को देखने के लिए आतुर थे। मकड़ी ने एक बड़ा सा जाला बना रखा था और उसमे बैठकर मच्छर को ललकार रही थी।

 

 

 

 

 

 

मच्छर दूर से ही भन-भना रहा था। लेकिन एक बार क्रोध के आवेश में उसने मकड़ी पर आक्रमण कर दिया। लेकिन मकड़ी के चक्रव्यूह रचना में ऐसा उलझा “जैसे कौरवों के चक्रव्यूह में अभिमन्यु” परिणाम स्वरूप मच्छर को वीरगति की प्राप्ति हुई और मकड़ी निर्विवाद रूप से राजा हो गयी, लेकिन समय का चक्र चलता गया।

 

 

 

 

 

 

 

छिपकली चूहे से बोली, “एक मकड़ी इस जंगल पर राज्य करे यह हमें स्वीकार नहीं है।” चूहे ने छिपकली से पूछा, “क्या होना चाहिए ?”

 

 

 

 

 

छिपकली चूहे से बोली, “जाकर मकड़ी से कहो कि हमारी चुनौती स्वीकार करे अन्यथा राजा का पद त्याग करे।”

 

 

 

 

 

चूहे ने मकड़ी को छिपकली की चुनौती बतायी – अब तो मकड़ी के लिए इधर कुंआ उधर खांई वाली बात हो गयी। दूसरे दिन जंगल के प्राणी यह मुकाबला देखने के लिए उपस्थित थे।

 

 

 

 

 

 

मकड़ी को आभास हो गया था कि छिपकली उसका चक्रव्यूह भेद देगी। जिस तरह अर्जुन ने चक्रव्यूह को भेदकर अपने पुत्र अपने पुत्र अभिमन्यु का बदला लिया था। उसी तरह छिपकली ने मकड़ी का कहकरव्यूह भेद दिया और मकड़ी को भी वीरगति की प्राप्ति हुई।

 

 

 

 

 

 

 

सभी जंगल वासी मिलकर छिपकली को राजा मान लिया। जंगल में हर चार दिन के पश्चात सत्ता के लिए संघर्ष चलता रहता था। चार बीतने के पश्चात कौवे ने अपने मित्र कबूतर से कहा, “मित्र कबूतर क्या हमें एक छिपकली को अपना राजा स्वीकार करना चाहिए ?”

 

 

 

 

 

 

इसपर कबूतर ने कहा, “कदापि नहीं।”

 

 

 

कौवे ने कबूतर से कहा, “जाकर हमारी ललकार को छिपकली को सुना दो, वह हमसे मुकाबला करे या फिर गद्दी छोड़ दे।”

 

 

 

 

 

यह बात जब छिपकली को मालूम हुई तो उसने लड़ते हुए स्वर्गलोक की कामना की। कौवा और छिपकली के बीच मुकाबला शुरू हो चुका था। थोड़े से ही प्रयास में कौवे ने छिपकली की गर्दन को पकड़ा और उसकी स्वर्ग जाने की इच्छा को पूर्ण कर दिया।

 

 

 

 

 

 

जैसा कि उस जंगल की नियति बन गयी थी, वहां प्रायः आये दिन ही जंगल की प्रजा के कारण ही कोई दूरदर्शी और ताकतवर नेतृत्व नहीं मिल रहा था। प्रत्येक चार दिन के उपरांत जंगल की बागडोर किसी दूसरे के नियंत्रण में चली जाती थी।

 

 

 

 

 

 

पांचवे दिन पक्षियों में अपनी चपलता और शिकार के लिए विख्यात बाज ने अपने मित्र तोता से पूछा – यह कर्कश वाणी वाला काला कलूटा पक्षी क्या इस जंगल पर शासन करने योग्य है ?

 

 

 

 

 

 

बाज की बात सुनने के बाद तोते ने कहा, “यह काला कलूटा कौवा हमेशा कांव-कांव करने वाला हम लोगों पर शासन कैसे कर सकता है।”

 

 

 

 

 

बाज ने तोते को आदेश दिया, “कौवे से जाकर कहो सिंहासन छोड़ दे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे।” तोता ने यह बात कौवे को बताई इसपर कौवे ने कहा, “जाओ बाज से कह दो युद्ध के उपरांत ही फैसला होगा, कि इस जंगल का राजा कौन होगा ?”

 

 

 

 

 

इस बार जंगल वासियों को युद्ध कला का अद्वितीय अंदाज देखने को मिला। कौवे ने भी हार न मानाने की ठान रखी थी, क्योंकि वह कच्चा खिलाड़ी नहीं था।

 

 

 

 

 

जिस तरह एक शिकारी की रणनीति को दूसरा शिकारी भली-भांति परख लेता है। उसी तरह दोनों ही एक दूसरे को परखकर दाव चल रहे थे। दोनों की ताकत क्षीण हो चली थी। कौवे ने भी अपनी युद्ध कला से बाज जैसे ताकतवर पक्षी को अपनी रणनीति बदलने पर विवश कर दिया।

 

 

 

 

 

 

 

दोनों पक्षों के लड़ने पर अंत समय में जो अपने साहस और कौशल का संरक्षण कर के वार करता है विजय श्री उसी का वरण करती है। कौवे ने बाज को इस युद्ध में छठी का दूध याद दिला दिया था।

 

 

 

 

 

 

बाज ने पुनः प्रयास किया कौवा भी बाज के प्रहार से अधमरा हो चुका था। इस बार बाज के प्रहार से बच नहीं सका, जिसके परिणाम स्वरूप वह स्वर्गलोक गमन कर गया।

 

 

 

 

 

 

जंगल के सभी पशु-पक्षियों ने बाज को अपना राजा मान लिया। जैसा कि सभी को ज्ञात है समय अनवरत ही चलता रहता है। किसी का समय एक सा नहीं रहता है और बाज भी इससे अछूता न था। सब दिन होत न एक समान।

 

 

 

 

 

 

 

एक महीने के उपरांत एक दिन एक आखेटक जंगल में आखेट करने आया। उसने जंगल के दृश्य का अवलोकन किया, हर जगह नीरवता छाई हुई थी। कहीं पक्षियों का कोलाहल नहीं, कहीं हाथियों का चिंघाड़ना नहीं, शेर की दहाड़ नहीं सब कुछ शांत था।

 

 

 

 

 

 

 

वह एक वृक्ष के नीचे खड़ा होकर कुछ सोच रहा था, तो सामने से एक बंदर आता हुआ दिखाई दिया। आखेटक ने बंदर को रोककर प्रश्न किया, “यहां का राजा शेर कहीं दिखाई नहीं देता है। वह कहां है ?”

 

 

 

 

 

 

 

बंदर ने शरू से लेकर सब कहानी आखेटक को कह सुनाई। आखेटक ने कहा, “एक मच्छर ने सबके दिल से शेर का डर समाप्त कर दिया। इसलिए यहां सत्ता के लिए संघर्ष शरू हो गया था।”

 

 

 

 

 

 

आखेटक को लगा जब तक कोई एक सक्षम नेतृत्व नहीं होगा यहां की स्थिति ऐसे ही रहेगी। जिस प्रकार भय के बिना प्रीति नहीं होती उसी प्रकार यहां भी अराजकता रहेगी।

 

 

 

 

 

 

आखेटक ने बंदर से पूछा, “बाज कहां है ?”

 

 

 

 

 

बंदर ने कहा, “वह देखो पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर पत्तों के ओट में बैठा इधर ही देख रहा है।”

 

 

 

 

 

आखेटक ने सरसंधान किया परिणाम स्वरूप बाज जमीन सूंघने पर मजबूर हो गया। आखेटक ने कहा, “जाओ इस जंगल के सभी प्राणियों को हमारे समक्ष उपस्थित करो।”  बंदर ने ख़ुशी-ख़ुशी यह कार्य किया।

 

 

 

 

 

 

 

दूसरे दिन आखेटक के समक्ष जंगल के सभी प्राणी उपस्थित थे। आखेटक जंगल के सभी प्राणियों को सम्बोधित कर रहा था। आप लोग देखो शेर को चुनौती देने के पश्चात किस तरह इस जंगल में आधिपत्य को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी।

 

 

 

 

 

 

कोई भी प्राणी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि किसी भी पल यहां राजसत्ता बदल जाती थी और एक राजा दूसरे के बनाये जनहित के कानून को बदलकर अपने फायदे के लिए नया कानून बना देता था, और अब मैं आप लोगों के सामने इस स्थिति को बदलकर एक सक्षम हाथों में इस जंगल की बड़ा सौंप दूंगा।

 

 

 

 

 

 

 

मुझे यहां का अनिश्चित माहौल बदलना ही पड़ेगा। आखेटक ने शेर को बुलाकर जंगल की बागडोर उसके सक्षम हाथों में दे दिया। जंगल में पुनः मंगल व्याप्त हो गया।

 

 

 

 

 

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