Sunday, 09 August, 2020

Comedy Story in Hindi 2018 / 3 मजेदार हिंदी कॉमेडी की कहानियां जरूर पढ़ें


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Comedy Story in Hindi मित्रों इस पोस्ट में 5 Comedy Story in Hindi For Drama दी गयी हैं।  आप यह जरूर पढ़ें और इसे शेयर भी जरूर करें। 

 

 

 

 

Comedy Story in Hindi Written ( रंगीला की तबीयत ) 

 

 

 

 

1- एक बार चंदू रंगीला बीमार हो गए।  वे दवा लेने के लिए दवाखाने पहुंचे, लेकिन दवा कुछ काम नहीं  की तो वे फिर से डाक्टर के पास पहुंचे।  वहाँ डाक्टर साहेब ने उनसे पूछा, ” तो रंगीला जी तबियत कैसी है ? ”

 

 

 

चंदू रंगीला ने कहा, ” तबियत बढियाँ ही होती तो काहे आते यहाँ।  हमको मजा थोड़े ही मिलता है।  ”

 

 

 

डाक्टर ने कहा, ” अरे काँहे नाराज हो रहे हो रंगीला जी।  यह बताओ जो दवा दी थी वह खा ली थी। ”

 

 

 

चंदू  रंगीला, ” अरे कैसी बाते कर रहे हो ? दवा तो भरी ही थी।  खाली काँहे होगी ? ”

 

 

डाक्टर थोड़ा इधर – उधर देखते हुए, ” अरे, मेरा मतलब है, दवा पी ली थी। ”

 

 

चंदू  रंगीला, ” अरे नहीं, दवा लाल थी।  आपने ही तो दिया था। ”

 

 

 

डाक्टर साहेब गुस्साते हुए, ” अरे, मेरा मतलब है।  दवा को पी लिया था। ”

 

 

 

चंदू ने कहा, ” अरे डाक्टर साहेब पहले अपना ही इलाज करा लो। दवा को नहीं मुझे पीलिया था। ”

 

 

 

डाक्टर साहेब सर पीटते हुए बोले, ” तू मुझे पागल ही कर देगा। ”

 

 

चंदू – मेरी नजर में पागलों का एक बहुत ही बढ़िया डाक्टर है।  कहो तो पता बताऊँ। ”

 

 

 

डाक्टर परेशान होते हुये, ” अबे यहां से जाने का क्या लेगा ? ”

 

 

 

चंदू रंगीला ने कहा, ” ज्यादा नहीं, बस ५०० रुपये। ”

 

 

 

डाक्टर से तुरंत ही उसे ७०० रूपये देते हुए कहा, ” जा तुरंत जा। ”

 

 

 

चंदू रंगीला, ” अच्छा डाक्टर साहेब, अब कब आना है ? ”

 

 

 

डाक्टर ने कहा, ” कभी नहीं।  तुम एकदम ठीक हो। ”

 

 

चंदू ने फिर कहा, ‘ जब मैं ठीक हूँ तो चेकअप क्यों किये ? इसका मतलब मैं बीमार हूँ ? ”

 

 

डाक्टर ने सोचा, यह फिर से परेशान करेगा तो उसने कहा, ” गलती हो गयी मेरे बाप।  माफ़ कर दे। ”

 

 

चंदू रंगीला ने कहा, ” ठीक है।  कितनी बार माफ़ करू।  एक बार या दो बार ? ”

 

 

डाक्टर – भाई दो बार ही कर दो ”

 

 

चंदू – नहीं, मैं तो एक बार ही माफ़ करूंगा।

 

 

डाक्टर – ठीक है एक बार ही माफ़ करो।

 

 

चंदू – लेकिन दूसरी बार क्यों नहीं ?

 

 

डाक्टर – अरे भाई, जान छोड़ दे मेरी।

 

 

चंदू – तो लाओ १००० रुपये।

 

 

डाक्टर ने उसे १००० रुपया दे दिया और किसी तरह से जान छुड़ाई और आगे एक बोर्ड लगा दिया, ” यह पागलों का दवाखाना नहीं है। ”

 

 

 

 

 नोक – झोंक 

 

 

 

 

2- यह कहानी Comedy Story in Hindi 2020 पति – पत्नी के नोक-झोक पर आधारित है।  सन्डे के दिन अगर पति देर देर तक सोया रहे तो…बीवी कहती है – अब उठ भी जाओ, तुम्हारे जैसा भी कोई है क्या भला ? अब छुट्टी मिल गयी है तो बस सोते ही रहना है।

 

 

 

 

और अगर पति जल्दी से उठ जाए तो – बीवी कहती है…पिछले जन्म में मुर्गे थे क्या ? एक ही दिन तो सोने को मिलता है, उसमे भी सुबह – सुबह उठ जाते हो।  अब सुबह उठाकर करोगे क्या ?

 

 

 

 

और अगर सन्डे को पति अगर घर पर ही रहे तो बीवी कहती है – बीवी कहती है….अरे कुछ काम भी कर लिया करो।  एक दिन का समय मिलता है कुछ घर के काम में हाथ बता लिया करो।

 

 

 

 

और अगर सन्डे की दिन पति घर से बाहर हो तो, बीवी कहती है कहाँ थे पुरे दिन ? अरे कुछ पूजा – पाठ कर लिया करो।  कुछ समय भगवान् का नाम भी ले लिया करो।

 

 

 

और अगर सन्डे के दिन पति पूजा करे तो बीवी कहती है…..यह घंटी बजाने से कुछ ना होने वाला है।  मेहनत करो।  कुछ काम – धंधा करो।

 

 

 

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और अगर पति खूब म्हणत करने लगे तो बीवी कहती है…..हर वक्त बस काम ही काम….क्या बंधुवा मजदूर हो क्या ? कभी मेरे साथ भी टाइम स्पेंड करो।

 

 

 

और अगर पति पत्नी को घुमाने ले जाए, उसके साथ Time Spend करे तब बीवी कहती है…..अरे कहीं फॉरेन चलो…नहीं तो गोवा, मुंबई, नैनीताल चलो।  यह क्या मेले मे घुमाने लाये हो ?

 

 

 

 

और अगर पति उसकी बात मान ले और उसे गोवा, Mumbai, नैनीताल, मसूरी ले जाए तो बीवी कहती है…..अरे क्यों इतना पैसा खर्च कर रहे हो ? अरे इस पैसे से कितना काम हो जाता ?

 

 

 

मतलब बीवी के साथ भी नहीं जमती और उसके बिना भी नहीं जमती। यह प्यार भरी नोक-झोक भी चलती रहती है।

 

 

 

 

Comedy Story in Hindi Pdf ( इकोनामी वारियर्स )

 

 

 

 

3- इकोनामी वारियर्स – इस कहानी को लिखने का विचार मेरे मन में कोरोना के कारण हुए Lokdown के बीच में आया।  अब कुछ काम – धंधा तो था नहीं तो सोचा चलो अब इसे ही लिख दिया जाए।

 

 

 

 

अब इसे कहानी ना समझकर हकीकत ही समझिये, क्योंकि यह आखों देखी और कानो सुनी है। Lokdown के करीब एक ३५ दिन बीत गए थे, लेकिन पुलिस के द्वारा लोगों की की गयी पिटाई का चलचित्र मानों दिल और दिमाग में अपना घर बना लिया था।

 

 

 

 

अगर कहीं भी बाहर निकलने और कुछ सामान लाने की बात भी सुनाई देती तो पुरे बदन में सिहरन दौड़ जाती।  हालांकि अभी तक पुलिसिया प्रसाद से मैं वंचित ही था, लेकिन उसके प्रसाद के स्वाद का भरपूर आभास था।

 

 

 

 

वैसे मैं यह भी मानता हूँ कि पुलिस को कोई शौक नहीं है लोगों को पीटने की, लेकिन लोगों की हरकतों से वे भी परेशान हो जाते हैं और उसके बाद प्रसाद देना शुरू कर देते हैं और उसमें फंस जाते हैं हम जैसे वे जरूरतमंद जिन्हे वास्तव में बाहर जाने की जरुरत होती है।

 

 

 

 

सुबह के ८  बजे थे और मैं मस्त गहरी नीद में सोये पानीपुरी के सपने देख रहा था।  Lokdown में यही तो मुख्य काम था, जिससे समय कट जाता था।

 

 

 

 

कभी – कभी तो मैं सोचता था कुम्भकर्ण वाला वरदान मिल जाए कि जब तक लाकडाउन हो तब तक बस सोये ही रहो तो कितना अच्छा होता, लेकिन कभी अपना सोचा पूरा होता है क्या ? ऐसे ही पूरा होने लगे तो लोग कोरोना को ही ना मार डालते सोच-सोचकर।

 

 

 

 

खैर अभी मैं सोया पानी-पूरी के सपने देख रहा था और जैसे ही पानी-पूरी मुंह में डालने गया वैसे ही माँ ने कहा, ” उठ जाओ।  आज सामान लाने जाना है। ”

 

 

 

यह सुनते ही फिल्मों की तरह पानी – पूरी की प्लेट मेरे हाथ से छूट गयी और पानी – पूरी भी नीचे गिर गया और मैं घबराते हुए उठा और बोला, ” क्या लाना है ? ”

 

 

 

” अरे कुछ सब्जी और किराने की सामान और मेडिकल से एक दवा लानी है और तू इतना घबराया क्यों है ? ” माँ ने आश्चर्य से पूछा।

 

 

 

” वह पुलिस के प्रसाद से।  ” मेरे मुंह से अपने – आप निकल गया।

 

 

 

” पुलिस का प्रसाद ? यह क्या है ? कहीं पूजा वगैरह है क्या ?, लेकिन भीड़ तो जुटानी नहीं है तो फिर प्रसाद कैसा ? ” माँ ने एक झटके में इतने सारे प्रश्न पूछ डाले।

 

 

 

 

” अरे वह भीड़ जुटाने वाला नहीं बल्कि कम करने वाला प्रसाद है।  ” मैंने बड़े ही आराम से उस पिटाई के दृश्य को सोचते और महसूस करते हुए बोला।

 

 

 

 

” हैं ? यह कैसा प्रसाद है ? तूने कभी खाया क्या ? ” माँ ने पूछा।

 

 

 

” अरे नहीं – नहीं, ना तो खाया और ना ही खाना है।  इसलिए तो मार्केट नहीं जाना चाहता हूँ।  ” मैंने कहा।

 

 

 

” क्यों प्रसाद नहीं खायेगा ? ” माँ ने गुस्से से कहा।

 

 

 

” अरे वह पुलिस वाले जो बाहर निकलने पर लोगों की पिटाई कर रहे हैं ना,  उसकी बात कर रहा हूँ।  ” मैं माँ को समझाते हुए कहा।

 

 

 

” तो ऐसा बोल ना।  जो बेवजह बाहर जाएंगे तो वे प्रसाद पाएंगे ही।  सरकार ने सबके भलाई के लिए घर में रहने को कहा है ना।  ” माँ ने कहा।

 

 

 

” तो यह क्या है ? सोमरस की दुकानों पर भीड़।  इन्हे क्यों नहीं सरकार और पुलिस ? इतनी भीड़ लगी हुई है।  उसके बाद जो हंगामें होंगे वह अलग।  ” मैंने गुस्से से कहा।

 

 

 

 

” अरे कैसी बात कर रहा है।  यह लोग तो दिव्यपुरुष हैं।  इनके वजह से तो सरकार के पास पैसा आता है और फिर सरकार हमें देती है।  कितना भी सोमरस महँगा हो जाए यह उफ़ तक नहीं करते हैं।  यही तो इकॉनमी वारियर्स हैं।  आज ही मैंने एक जगह पढ़ा…..’अगर यह फ्री में पीते हैं तो सरकार बदल देते हैं और खरीद कर पीते हैं तो अर्थव्यवस्था। ‘ सचमुच इसके बाद तो मेरे मन में इनके प्रति कृतज्ञता के भाव और अधिक बढ़ गए….

 

 

 

 

मैं समझ गया कि इकॉनोमी वारिययर्स का प्रवचन लंबा चलेगा सो मैंने झोला उठाया और बाहर निकल कर सड़क के दोनों तरफ नजर घुमाई और पास के किराने की दूकान पर सामान लेने चला गया।

 

 

 

 

 

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