3 Best Panchatantra Ki Kahaniya in Hindi / चूहा और बिल्ली की कहानी

3 Best Panchatantra Ki Kahaniya in Hindi / चूहा और बिल्ली की कहानी

Panchatantra Ki Kahaniya मित्रों इस पोस्ट में पंचतंत्र की कहानिया हिन्दी ( Panchatantra Ki Kahaniya Free ) दी गयी हैं। सभी  Top Panchatantra Ki Kahaniya बहुत ही अच्छी हैं।

 

 

 

Panchatantra Ki Kahaniya Written ( चूहा और बिल्ली की कहानी )

 

 

 

 

 

किसी जंगल में एक पेड़ के नीचे बिल में एक सांप रहता था। कुछ दिन बाद एक चिड़िया उड़ते हुए उस जंगल में एक अच्छे की पेड़ की तलाश कर रही थी जिसपर वह घोसला बनाकर अंडे दे सके। बहुत तलाश करने के बाद उसे एक बहुत घना आम का पेड़ दिखाई दिया।

 

 

 

 

उसने उसी पेड़ पर घोसला बनाने की सोची। वह तिनका जुटाकर अपना घोसला उस पेड़ पर बनाकर रहने लगी। वह पेड़ सांप के बिल से कुछ ही दूरी पर था।

 

 

 

 

कुछ दिन बाद उस चिड़िया ने अंडे दिए। थोड़ी देर बाद सांप भी अपने बिल से बाहर निकला तो उसे पेड़ के ऊपर अंडे दिखे। वह चिड़िया के उड़ने का इंतजार करने लगा।

 

 

 

 

 

कुछ समय बाद चिड़िया दाना चुगने के लिए उड़ गई। सांप ने मौके का फायदा उठाया और पेड़ के ऊपर जाकर अंडे को खा गया। चिड़िया जब वापस आई तो उसे अंडे घोसले में नहीं मिले। यह देखकर वह बहुत उदास हुई।

 

 

 

 

 

उसने कुछ दिन बाद फिर से अंडे दिए। सांप ने उसे वापस खा लिया। अब उसने इस बात का पता लगाना चाहा। कुछ समय बाद उसने फिर से अंडे दिए और पास के एक पेड़ पर जाकर छुप गई।

 

 

 

 

सांप फिर आया और अंडे को खा गया। चिड़िया ने काफी प्रयास की लेकिन अपने अंडे को नहीं बचा पाई। वह अब सांप को सबक सिखाने का तरकीब सोचने लगी।

 

 

 

 

 

कुछ देर बाद वह उड़ गई और एक राजा के राज्य में पहुंच गई। वहां राजा की लड़की अपने कुछ सहेलियों के साथ नदी के किनारे खेल रही थी। खेलते हुए राजकुमारी का हार उसके गले से निकलकर गिर गया।

 

 

 

 

 

उसने सिपाहीयों को आवाज लगाई। सिपाहियों के आने पर राजकुमारी ने उन लोगो को अपने हार गुम होने की बताई और ढूढ़ने को कहा। सभी सिपाही हार ढूढ़ने लगे।

 

 

 

 

 

उसी समय चिड़िया भी वहां पहुंची और उसकी नजर उस हार पड़ी। उसने हार उठाया और उड़ गई। तभी राजकुमारी की निगाह उस चिड़िया के ऊपर गई।

 

 

 

 

उसने सिपाही से कहा, “देखो चिड़िया हार लेकर उड़ रही है।”

 

 

 

सभी सिपाही उस चिड़िया का पीछा करने लगे। चिड़िया उड़ते हुए उस हार को सांप के बिल में डाल दिया और अपने घोसले में चली गई। सिपाही अब उस बिल को ध्वस्त करने लगे। तभी उसमे से सांप निकला, सांप के निकलते ही सभी सिपाही मिलकर उसे मार दिए।

 

 

 

काली जबान वाला गधा पंचतंत्र कहानी ( Donkey Panchatantra Hindi Stories ) 

 

 

Best Panchatantra Ki Kahaniya
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2- Panchatantra Ki Kahaniya To Read – एक जंगल में ढेर सारे जानवर रहते थे। जिसमे गधों का भी झुण्ड था और उस झुण्ड में काली जबान वाला एक गधा रहता था। काली जबान वाले गधे के विषय में पूरे जंगल में यह बात फ़ैल गई थी कि काली जबान वाला गधा किसी को भी जो बात अच्छी हो या बुरी वह कहने पर सत्य हो जाती है।

 

 

 

 

 

 

इसलिए गधे की झुण्ड में भी उससे कोई बात नहीं करता था क्योंकि काला जबान वाला गधा कब किसी को क्या बोल दे ? इसलिए सभी जानवर उससे डरते थे। यह बात जंगल के राजा शेर तक पहुंची।

 

 

 

 

 

वह अपने मंत्री भालू को बोला, “जाकर गधे को हमारे सामने हाजिर करो।”

 

 

 

 

भालू काली जबान वाले गधे के पास गया और बोला, “तुम्हे शेर महाराज ने बुलाया है। चलकर उन्हें सलाम करो।”

 

 

 

इसपर काली जबान वाले गधे ने कहा, “तुम जाकर शेर को बोलो वह आकर हमें सलाम करे मैं सलाम करना नहीं जनता। मैं सिर्फ दुलत्ती मारना जानता हूँ।”

 

 

 

 

 

भालू ने थोड़ा अकड़ दिखाई तो काली जबान वाले गधे ने कहा, “ज्यादा बक-बक मत करो नहीं तो तुम्हारे ऊपर पेड़ की डाल गिर जाएगी।”

 

 

 

 

यह कहते ही सचमुच ही पेड़ की डाल टूटकर भालू के ऊपर गिर गई और भालू घायल हो गया। वह लौटकर शेर के पास गया। शेर ने पूछा, “गधे को क्यूं नहीं लाए ?”

 

 

 

 

इसपर भालू ने कहा, “उसने अपनी काली जबान से पेड़ की डाल मेरे ऊपर गिरा दी।”

 

 

 

 

यह बात सुनकर शेर आगबबूला हो गया। वह अपने दो सिपाहियों लकड़बग्घा और बंदर को बोला, “जाओ तुम दोनों काली जबान वाले गधे को पकड़कर यहां लाओ।”

 

 

 

 

 

लकड़बग्घा और बंदर दोनों काली जबान वाले गधे को घेरकर शेर के पास लाए। गधा शेर के सामने गया तो देखा सभी जानवर शेर को सलाम कर रहे थे। शेर ने गधे से कहा, “तुम मुझे सलाम करो।”

 

 

 

 

 

गधे ने दुलत्ती झाड़ते हुए अपने पिछले दोनों पैरों को ऊपर उठाया। शेर बोला, “तुम हमारा अपमान कर रहे हो। अब मैं तुम्हे अवश्य दंड दूंगा।”

 

 

 

 

 

लकड़बग्घा बोला, “महाराज, आप क्यूं तकलीफ कर रहे है। मैं इसे सबक सिखाता हूँ।”

 

 

 

 

गधे ने कहा, “लकड़बग्घे तू कई हाथियों को नोचकर खाता है। लेकिन हमारे पास आने से तेरे दांत टूट जाएंगे।”

 

 

 

 

लेकिन लकड़बग्घे ने बात को अनसुनी करते हुए गधे की गर्दन दबोच ली। लेकिन कुछ ही पलों में लकड़बग्घा चिल्लाते हुए गधे को छोड़ दिया। शेर ने पूछा, “क्या हुआ ?”

 

 

 

 

 

लकड़बग्घे ने तड़पते हुए कहा, “मेरे सारे दांत टूट गए।”

 

 

 

इसपर भालू ने कहा, “मैंने पहले ही कहा था। यह काली जबान वाला गधा जो कहता है वह सत्य हो जाता है।”

 

 

 

 

अब शेर गुस्से में अपनी दुम पटकने लगा और बोला, “गधे मैं तेरी बोटियाँ नोचकर सबको दावत खिलाऊंगा।”

 

 

 

 

 

गधे ने कहा, “अरे शेर हमारे पास पहुंचते-पहुंचते तुम्हारे हाथ पांव सलामत नहीं रहेंगे।”

 

 

 

 

यह सुनते ही शेर ने गधे के ऊपर छलांग लगा दी लेकिन बीच रास्ते में ही गिर पड़ा। बंदर सिपाही बोला, “महाराज आप क्यूं नहीं उठते हो।”

 

 

 

 

 

शेर बोला, “हमारे हाथ पांव काम करना बंद कर दिया है और चक्कर आ रहा है।”

 

 

 

अब गधे की बारी थी। गधे ने कहा, “तुम सभी मुझे सलाम करो।”

 

 

 

 

लेकिन कोई भी जानवर गधे को सलाम नहीं करना चाहता था। गधे ने कहा, “जल्दी सलाम करो नहीं तो मैं तुम लोगों के विषय में कुछ भी बुरा बोलूंगा।”

 

 

 

 

सभी जानवर डरकर एक साथ गधे को सलाम करने लगे। गधे ने दूसरा हुक्म सुनाया, “मैं जाकर सिंहासन पर बैठता हूँ। तुम सब जाकर हमारे लिए हरी-हरी बढ़िया घास लेकर लाओ।”

 

 

 

 

सभी जानवरों ने गधों की आज्ञा का पालन किया। अब जंगल में सिंह राज नहीं गधा राज था। कोई चाहकर भी उस गधे का कुछ नहीं बिगाड़ सका। एक दिन शेर उदास होकर कही जा रहा था। उसकी मुलाकात चतुर सियार से हो गई।

 

 

 

 

 

 

चतुर सियार ने पूछा, “आप इतने उदास क्यूं है महाराज ?”

 

 

 

शेर ने कहा, “अब मैं महाराज नहीं हूँ। वह गधा महाराज है और पूरी बात बता दिया।”

 

 

 

 

इसपर सियार ने कहा, “ठीक हैं, अब मैं कोई उपाय सोचता हूँ।”

 

 

 

 

दूसरे दिन सियार एक फरमान लेकर गधे के सामने हाजिर हुआ और शेर की जय बोलने लगा। गधे ने कहा, “ओ सियार यहां का राजा मैं हूँ तुम्हे हमारी जय बोलनी चाहिए।”

 

 

 

 

 

सियार ने कहा, “मैं तुम्हे नहीं जनता। मैं शेर महाराज को जनता हूँ और मैं उनके लिए फरमान लेकर आया हूँ।”

 

 

 

 

 

गधे ने कहा, “फरमान लाओ मैं पढ़ता हूँ।”

 

 

 

सियार यही चाहता था। उसने गधे को फरमान दे दिया। फरमान में लिखा हुआ था। दो मुस्टंडे आएंगे और गधे की गर्दन दबोचकर फेक देंगे। गधे के पढ़ते ही वैसा हो गया। दो मुस्टंडे आये और उसकी गर्दन दबोचकर फेक दिए। अब शेर फिर से राजा बन गया।

 

 

 

Cat And Mouse Panchatantra Ki Kahaniya Writing ( बिल्ली और चूहे की कहानी ) 

 

 

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3- गंगापुर में हरिनाथ नाम का एक बहुत ही सदाचारी किसान रहता था। ईश्वर की कृपा से उसे किसी भी वस्तु की कमी नहीं थी। उसके पास गाय और भैस बहुतायत ही थे। अतः उसे दुग्ध से संबंधित किसी वस्तु का अभाव न था।

 

 

 

 

उसके गृह में अनेक पशु-पक्षियों की उदर पूर्ति होती थी। हरिनाथ किसी को भी परेशान नहीं करता था। लेकिन एक काली बिल्ली हरिनाथ को बहुत ही तंग करती थी।

 

 

 

 

हरिनाथ जब भी गाय भैस का दुग्ध निकालकर घर में रखता तो वह बिल्ली अपने उदर की पूर्ति के लिए रखे हुए दुग्ध पर झपट पड़ती। वैसे ही जैसे धावक लम्बी कूद का आभास करता हो।

 

 

 

 

 

परिणाम स्वरूप वह दुग्ध काली बिल्ली के उदर में कम ही जाता था और इसी प्रयास में दुग्ध धरनी पर गिरने के उपरांत वैसे ही शोभायमान होता जैसे कोई पहलवान हारने के उपरांत धरनी पर गिरकर चारो खाने चित्त हो जाते है।

 

 

 

 

 

तत्पश्चात वह गिरा हुआ दुग्ध धरनी के आगोश में लज्जित होकर अपना अस्तित्व ही छुपा लेता वहां दुग्ध का नामोनिशान भी नहीं बचता था। बिल्ली की इस उदंडता से हरिनाथ को बहुत ही संताप होता क्योंकि दुग्ध किसी के उपयोग में नहीं आता और कोई भी उस दुग्ध का लाभ प्राप्त नहीं कर पाता।

 

 

 

 

 

 

हरिनाथ के घर के छोटे-छोटे बच्चे उस बिल्ली को मौसी कहकर चिल्लाते थे। गाय भैस का दुग्ध निकालकर हरिनाथ घर के अंदर प्रवेश किया तो उसके आगे पीछे बिल्ली अपने चक्रव्यूह की रचना में टहलने लगी कि मौका मिलते ही दुग्ध रूपी अभिमन्यु को अपने चक्रव्यूह में फसा कर प्रासन कर सकू।

 

 

 

 

 

बच्चों की सेना “मौसी आई, मौसी आई” कहकर “अभिमन्यु” की रक्षा के लिए प्रयास कर रहे थे। लेकिन बिल्ली मौसी की तीक्ष्ण नज़रे अपने लक्ष्य पर केन्द्रित थी।

 

 

 

 

 

हरिनाथ ने दुग्ध को एक मिट्टी के पात्र में ( मटके ) रखकर गरम करने के लिए अग्नि प्रज्वलित करने का प्रयास में “माचिस” लाने चले गए। बिल्ली मौसी तो जैसे उसी पल की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने अपने लक्ष्य पर निशाना साध ही लिया।

 

 

 

 

 

बच्चों का दल चिल्ला-चिल्लाकर उस लक्ष्य ( दुग्ध ) को बचाने का असफल प्रयास कर रहे थे। वह योद्धा ही क्या जो अपने विरोधियों की बौखलाहट का न उठा ले और बिल्ली वही प्रयास कर रही थी। उसे उन बच्चों को कोलाहल से रंच मात्र भी फर्क नहीं पड़ा।

 

 

 

 

 

 

हरिनाथ ने दूर से ही इस दृश्य को देखा तो उनकी क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी और उन्होंने एक डंडा उठाया ( आज भले ही दुग्धावसान हो जाय लेकिन काली बिल्ली के ऊपर वार खाली नहीं जाना चाहिए ) और उस काली कलूटी के ऊपर उस डंडे का जोरदार प्रहार किया।

 

 

 

 

 

 

बिल्ली का भाग्य प्रबल था। वह तो बच गई लेकिन प्रहार में दुग्ध धरनी के अंग में समा गया और मटका वीरगति को प्राप्त हुआ। मटका तो वीरगति को प्राप्त हो चुका था लेकिन मटके का ऊपरी भाग बिल्ली मौसी के गर्दन में शोभायमान हो रहा था।

 

 

 

 

 

 

यह दृश्य देखकर बालक समूह को अति आनंद का अनुभव हो रहा था। हरिनाथ भी अपनी हसी को रोक नहीं सका वह भी बालक समूह के साथ उनकी खुशियों में शामिल हो गया।

 

 

 

 

 

उस दिन के बाद से उस गृह में काली मौसी के दर्शन दुर्लभ हो गए लेकिन हरिनाथ चौकन्ना रहता था। काली बिल्ली को दुग्ध का स्वाद तो नहीं मिला लेकिन हरिनाथ के गृह से एक निशानी अवश्य मिल गई थी, जो उसके गले की शोभा में चार चांद लगा रही थी।

 

 

 

 

 

 

 

बिल्ली अपनी गर्दन को झटकना चाहा कि उसे अपने ऊपर आई हुई आफत से छुटकारा मिल जाए लेकिन वह अपने प्रयास में असफल रही। उसे देख-देखकर लोग अपनी हसी को रोक नहीं पाते और कुत्तों के हुजूम से बिल्ली की परेशानी और बढ़ जाती।

 

 

 

 

 

 

संध्या होने वाली थी। बिल्ली गांव के बाहर की तरफ जा रही थी तो रास्ते में उसे एक मुर्गा उसकी दशा देखकर दंग रह गया। मुर्गे ने बिल्ली से प्रश्न किया, “मौसी कहां जा रही हो और आपके गले में क्या है ?”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने उत्तर दिया, “बड़े भाग्य वालो को ही यह केदार कंगन जो हमारे गले की शान है मिलता है। इसलिए मैं केदार नाथ के दर्शन को जा रही हूँ। अगर तुम भी केदार नाथ के दर्शन की इच्छा रखते हो तो हमारे साथ चलो और इस सुअवसर का लाभ उठाओ।”

 

 

 

 

 

 

मुर्गा तैयार हो गया और बिल्ली के साथ प्रस्थान किया। रास्ते में एक कबूतर बिल्ली की स्थिति का अवलोकन करके अपनी हसी को रोक नहीं पाया। कबूतर ने बिल्ली से प्रश्न किया, “मौसी आप मुर्गे को लेकर बड़ी ही तीव्रता से कहां जा रही है और अपने यह कैसा आभूषण धारण कर रखा है ?”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने उत्तर दिया, “सबका ऐसा सौभाग्य कहां जो आभूषण धारण कर सके। यह केदार नाथ कंगन है और मैं केदार नाथ के दर्शन को जा रही हूँ जिसमे यह मुर्गा भी हमारा सहयोगी है। अगर तुम भी दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त करना चाहते हो तो हमारे साथ अवश्य ही चलो।”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली की बातों का प्रभाव कबूतर के ऊपर पड़ा और वह भी मुर्गे की तरह यात्रा में सहभागी हुआ। कुछ दूर चलने के पश्चात एक चूहे की दृष्टि बिल्ली के ऊपर पड़ी जो मुर्गा और कबूतर के साथ तीव्र गति से भागी जा रही थी

 

 

 

 

 

 

चूहे ने कौतुहल वस हसते हुए बिल्ली से प्रश्न किया, “मौसी आप अपनी सेना के साथ कहां प्रस्थान कर रही है ?”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने भी हसते हुए उत्तर दिया, “मैं अपनी सेना के साथ केदार नाथ के दर्शन के लिए जा रही हूँ और जो हमारे गले में कीमती माला शोभायमान हो रही है वह हमें युद्ध विजयी होने के उपरांत ही मिली है।”

 

 

 

 

 

बिल्ली ने चूहे से आगे कहा, “अगर तुम भी हमारे साथ चलना चाहते हो तो अवश्य चलो। लौटने के पश्चात मैं तुम्हे भीअपना प्रधान सेनापति बनाऊंगी।”

 

 

 

 

 

चूहा बिल्ली की चाल को समझ गया और इशारे से मुर्गा और कबूतर को चौकन्ना कर दिया। हम भी आपके साथ अवश्य चलेंगे मौसी क्योंक हमें भी दर्शन के उपरांत पुण्य लाभ लेना है। चूहे ने कहा और बिल्ली के साथ चल दिया।

 

 

 

 

 

रास्ते में चलते हुए एक खंडहर के दर्शन हुए। बिल्ली ने सबको आदेश दिया, “सभी लोग रात्रि विश्राम कर ले सुबह ही प्रस्थान होगा।” मुर्गे और कबूतर ने अपना उचित स्थान ग्रहण किया क्योंकि चूहा उन लोगों को पहले ही सावधान कर दिया था।

 

 

 

 

 

 

चूहे ने भी मोर्चे के लिए अपनी स्थित सुदृढ़ कर ली। एक सुरक्षित किले का निर्माण किया और बिल्ली को चुनती देने के अंदाज में बैठ गया। थोड़ी रात्रि के उपरांत अपने साथ आए इन तीन शिकार को देखकर उसकी क्षुधा की ज्वाला तीव्र हो उठी।

 

 

 

 

 

 

बिल्ली पहला प्रश्न मुर्गे से किया, “मुर्गे राजा यह बताओ कि तुम रात को किसी भी समय अपनी कर्कश वाणी से सबकी निद्रा को भांग करने का दुस्साहस कर बैठते हो। तुम्हारे इस दुस्साहस के फलस्वरूप हर किसी को यह भ्रम हो जाया करता है कि अब सुबह होने वाली है।”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने मुर्गे से आगे कहा, “उसे इस बात का ज्ञान नहीं रहता है कि अभी रात बहुत है। ऐसे में कोई व्यक्ति अपने कार्य में लगने के कारण हानि उठाता है तो इसकी जवाबदारी किसकी है ?  उत्तर दो। नहीं तो मैं अपना ग्रास अवश्य ही बनाऊंगी।”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने दूसरा प्रश्न कबूतर से पूछा, “कबूतर सिंह तुम किसान के खेतों से सरसो के दाने क्यूं चुग लेते हो क्या तुम्हे मालूम नहीं किसान कितने परिश्रम से अपने खेतों की बुआई करता है और तुम उसे विफल करने का प्रयास करते हो तुम्हारे इस प्रयास से किसान को हानि उठानी पड़ती है। तुम ऐसा क्यूं करते हो जवाब दो अन्यथा तुम्हारी भी खैर नहीं ?”

 

 

 

 

 

अब चूहे की बारी थी। बिल्ली ने चूहे से प्रश्न किया, “मूषक राज तुम मनुष्यों के बहुत ही कीमती कपड़े की धज्जियां उड़ा देते हो, उन्हें तार-तार कर देते हो। तुम्हारे इस घृणित प्रयास से मनुष्यों की बहुत ही हानि होती है। अगर किसी को कहीं जरुरी कार्य से जाना पड़ा और तुम उसके कपड़ों को तार-तार कर देते हो।”

 

 

 

 

 

 

बिल्ली ने चूहे से आगे कहा, “तुम इस बात लगा सकते हो उस समय क्या स्थिति होगी। तुम्हारे इस घृणित कार्य से मनुष्य को बहुत ही क्षति होती है। तुम ऐसा क्यूं करते हो। जवाब दो नहीं तो सबसे पहले तुम्हे दंड भुगतना होगा।”

 

 

 

 

 

चूहे ने गाला साफ करते हुए बिल्ली से पूछा, “क्या मौसी तुम मेरे एक छोटे से प्रश्न का उत्तर दे सकती हो ?”

 

 

 

 

“तुम्हारा भी अधिकार है। तुम हमसे प्रश्न पूछ सकते हो” बिल्ली ने चूहे को खुश करते हुए कहा।

 

 

 

 

 

चूहे ने बिल्ली से प्रश्न किया, “मौसी तुम किसी भी किसान के यहां ‘दुग्ध’ प्रासन कर लेती हो या गिरा देती हो क्या तुम्हे ज्ञात है कि तुम्हारे इस कुत्सित प्रयास के कारण किसान कितना परेशान हो जाता है। उसके छोटे बच्चे दुग्ध के अभाव में भूखे रहने के लिए मजबूर हो जाते है। इसका दोषी कौन है और उसे क्या दंड मिलना चाहिए ? ”

 

 

 

 

चूहे का इतना तीक्ष्ण वार बिल्ली सहन नहीं कर सकी और उसने चूहे के ऊपर आक्रमण कर दिया। लेकिन चूहा अपने अभेद्य किले में सुरक्षित था। कबूतर और मुर्गे ने मौके का फायदा उठाया और नौ दो ग्यारह हो गए। बिल्ली हाथ मलती रह गई।

 

 

 

 

 

इसलिए ही कहा गया है। बेर और केले की मित्रता कदापि अच्छी नहीं है।

 

 

 

 

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