Akbar And Birbal Story in Hindi / अकबर बीरबल की हिंदी कहानियां

Akbar And Birbal Story in Hindi / अकबर बीरबल की हिंदी कहानियां

Akbar And Birbal Story in Hindi एक बार बीरबल के साथ बादशाह अकबर सवेरे की शैर पर निकले हुए थे। उनके साथ और दरबारी थे। बादशाह जैसे ही शाही बाग़ में पहुंचे वहां पहले से ही ढेर सारे कौवे थे और बाद में भी कौवे का आना जारी था।

 

 

Akbar And Birbal Story in Hindi With Moral ( अकबर बीरबल की कहानियां )

 

 

 

 

अकबर बादशाह ने बीरबल की तरफ देखते हुए कहा, “हमारे राज्य में कौवो की संख्या में बहुत इजाफा हो गया है क्या तुम बता सकते हो कि हमारे राज्य में कुल कितने कौवे है ?”

 

 

 

बीरबल ने कहा, “जहांपनाह हमें कौवो की गिनती करने के लिए कुछ समय दीजिए।”

 

 

 

 

अकबर ने कहा, “ठीक है। हम तुम्हे 3 दिन का वक़्त देते है। उसके बाद हमें पूरी जानकारी कौवो को लेकर चाहिए।”

 

 

 

 

बीरबल ने कहा, “आपको पूरी जानकारी मुहैया करा दिया जाएगा।”

 

 

 

 

हरीनाम एक गरीब किसान था। उसने बड़ी मेहनत से 100 अशर्फी जुटाई थी। उसके मन में तीर्थ यात्रा करने की इच्छा हुई, तो अब यह मुसीबत थी इन 100 अशर्फी को कहां रखा जाय जो हर तरह से महफूज रहे।

 

 

 

 

हरी का एक बचपन का दोस्त था। जिसका नाम चंदन था। जो इस समय बहुत धनवान हो गया था। हरी को लगा हमारी अशर्फी चंदन के पास महफूज रह सकेगी क्योंकि चंदन हमारा बचपन का दोस्त है और इस समय उसके पास पैसो की कमी नहीं है।

 

 

 

 

 

यह सोचकर हरी अपनी जीवन भर की कमाई 100 अशर्फी चंदन को दे दिया और बोला, “मैं तीर्थ यात्रा से वापस आऊंगा तब हमे अशर्फी वापस दे देना।”

 

 

 

 

चंदन ने हरी की अशर्फी अपने पास रख लिया। एक महीने के बाद हरी तीर्थ यात्रा से वापस आया और दिन चंदन के पास गया और अपनी दी हुई अमानत 100 अशर्फी मांगने लगा।

 

 

 

 

तब चंदन ने उसे डांट कर भगा दिया और बोला, “मैंने तुम्हारी कोई अमानत अपने पास नहीं रखा हूँ।”

 

 

 

 

अब हरी परेशान होकर बादशाह अकबर के दरबार में गया और न्याय की गुहार लगाई। बादशाह ने बीरबल को हरी की मुसीबत का हल तलासने के लिए कहा।

 

 

 

 

बीरबल ने हरी से पूछा, “जब तुमने अपनी अमानत चंदन को सौपा था तो वहां कोई गवाह मौजूद था।”

 

 

 

हरी बोला, “हुजूर, वहां कोई गवाह मौजूद नहीं था। चंदन हमारा बचपन का दोस्त था इसलिए हमने उसके ऊपर विश्वास कर लिया और अपनी पूरी जिंदगी की कमाई उसे सौप कर तीर्थ यात्रा पर चला गया। अब आप ही हमारी अमानत दिलवाइए हुजूर।”

 

 

 

बीरबल ने चंदन को दरबार में बुलाने का हुक्म दिया। कुछ समय बाद एक सिपाही चंदन को दरबार में हाजिर कर दिया। लेकिन चंदन ने अपने दोस्त हरी को पहचानने से इंकार  दिया।

 

 

 

 

बीरबल अब हरी को देखकर कहने लगा तुम चंदन के घर जाओ और जो भी गवाह मिले ( पेड़, पौधे, पशु, पक्षी ) उसे गवाह रूप में बुलाओ।”

 

 

 

 

हरी चंदन के घर की तरफ चला गया।  बीत जाने पर बीरबल ने कहा, “हरी अभी तक नहीं आया।”

 

 

 

तभी चंदन बोल उठा शायद हमारे घर के बगल में पीपल से गवाही के लिए कह रहा होगा। अब बीरबल को यकीन हो गया था कि चंदन ने सच में हरी की अशर्फी अपने पास रख लिया है क्योंकि उसे अब गवाही का डर सता रहा था।

 

 

 

 

बादशाह ने चंदन को हरी की अशर्फी वापस करने का फरमान सुना दिया और चंदन को जेल भिजवा दिया। अकबर बादशाह ने बीरबल से पूछा, “कौवो की गिनती का क्या हुआ ?”

 

 

 

 

बीरबल तो पहले से ही तैयार था। उसने कहा, “हुजूर, आपके राज्य में दस हजार पांच सौ पचपन कौवे है।”

 

 

 

 

अकबर ने बीरबल से पूछा, “क्या तुम ठीक गिनती करके कह रहे हो ?”

 

 

 

बीरबल ने कहा, “जहांपनाह, अगर कुछ कौवे परदेश गए होंगे तो उनकी संख्या कम हो सकती है। यदि कुछ बाहर से अपने घर आए होंगे तो उनकी संख्या बढ़ भी सकती है। अगर बाहर गए कौवे वापस नहीं आए होंगे तो हमने जितनी संख्या बताई है उतना ही कौवे है। आप चाहे तो किसी से भी गिनती करवा सकते है।”

 

 

 

बीरबल की चालाकी से बादशाह खुश था। उसने बीरबल को इनाम देने की मुनादी करवा दिया।

 

 

 

 

 

२- मोहन सिंह अकबर बादशाह का दरबारी था। वह फकीर और दरगाह मंदिर को बहुत मानता था। उसका मानना था कि फ़क़ीर की दुवा से और मंदिर की मुर्ति के आशीर्वाद से सभी आदमियों की मनोकामनाए पूर्ण होती है।

 

 

 

 

बादशाह और कई दरबारी भी मोहन सिंह की बातों से सहमत थे। लेकिन बीरबल उन सबकी बात सुनकर चुप था। बादशाह अकबर ने देखा बीरबल एकदम चुप बैठा है तो पूछा, “क्या तुम हम लोगों की बात से सहमत नहीं हो बीरबल ?”

 

 

 

बीरबल बोला, “जहांपनाह माफ़ी चाहता हूँ, मैं आप सबकी बात से इत्तेफाक नहीं रखता हूँ।”

 

 

 

 

बादशाह नाराज होते हुए बोला, “क्या तुम पीर फ़क़ीर और मंदिरो पर विश्वास नहीं करते हो ?”

 

 

 

बीरबल बोला, “जहांपनाह, हमारा इरादा किसी को ठेस पहुँचाने का नहीं था। मैं तो सिर्फ यह कह रहा था कि विश्वास के कारण ही सब कुछ होता है। जैसा जिसका विश्वास रहता है उसे वैसा ही फल मिलता है।”

 

 

 

बादशाह नाराज होते हुए कहा, “तुम अपनी बात साबित करो या हमारे राज्य से निकल जाओ।”

 

 

 

बीरबल बोला, “मैं अपनी बात सही साबित कर सकता हूँ लेकिन हमे दो महीने का वक़्त चाहिए।”

 

 

 

 

बादशाह बोला, “ठीक है। दो महीने का वक़्त दिया जाता है।”

 

 

 

 

बीरबल दरबार से निकल गया। बीरबल एक दिन अपने घर के बरामदे में टहल रहा था तो उसे एक तरकीब सूझ ही गई। वह अपने नौकर को बुलाकर कहा, “तुम यमुना  नदी के किनारे एक छोटा लेकिन देखने में सुंदर सा मंदिर एक महीने में तैयार करवा दो, चाहे जितने आदमी और पैसा लगे उसकी परवाह तुम मत करना।”

 

 

 

 

 

नौकर ने हामी भरी और चला गया। एक महीने के बाद जमुना नदी के किनारे पर एक सुंदर सा मंदिर तैयार हो गया था। बीरबल ने अपने नौकर को उस मंदिर के बारे में प्रचार करवाने के लिए कह दिया और मंदिर के दरवाजे को हरदम बंद करने के लिए कह रखा था और मंदिर का नाम बंद मूर्ति वाला मंदिर रख दिया था।

 

 

 

 

 

 

अब तो रोज ही मंदिर के सामने सैकड़ो लोगों की लाइन लगने लगी। देखते ही देखते पूजा करने के लिए और मन्नत मांगने के लिए हजारों की तादात में लोगों का हुजूम उमड़ने लगा क्योंकि जो कोई भी बंद मूर्ति वाले मंदिर में मन्नत मांगता था उसकी मन्नत अवश्य ही पूरी होती थी।

 

 

 

 

 

उस मंदिर की खासियत बादशाह अकबर के कानों में पड़ चुकी थी। वह बीरबल के सामने बंद मूर्ति वाले मंदिर के विषय में बड़े ही फक्र से बताने लगा और पूछा, “क्या तुम हमारे साथ उस बंद मूर्ति वाले मंदिर में चलना पसंद करोगे ?”

 

 

 

 

बीरबल बोला, “मैं आपके साथ अवश्य ही उस मंदिर में चलना पसंद करूँगा।”

 

 

 

 

बादशाह अकबर के साथ अन्य दरबार के लोग भी उस बंद मूर्ति वाले मंदिर को देखने पहुंचे, उन सभी के साथ ही बीरबल भी था। बादशाह ने उस मंदिर के पास जाकर मन्नत मांगी। हमारे सैनिक जो पश्चिम सीमा पर लड़ रहे है वह जीत जाए।

 

 

 

 

 

कुछ देर के बाद एक सिपाही दौड़ता हुआ आया। वह बादशाह से बोला, “जहांपनाह, हमारी सेना जीत गई है।”

 

 

 

 

बादशाह ने बीरबल की तरफ देखते हुए कहा, “बीरबल यह तो अच्छी बात है। लेकिन बीरबल यह इस मंदिर की खासियत है। जो हमारे कहते ही हमारी मुराद पूरी हो गई।”

 

 

 

 

बीरबल ने बादशाह के साथ आए हुए मोहन सिंह से कहा, “आप जाकर मंदिर में रखी हुई मूर्ति को ले आओ।”

 

 

 

मोहन सिंह मंदिर में गया और कपड़े में लिपटा कोई सामान उठा लाया। बीरबल ने उसे खोलकर बादशाह को दिखाया। वह एक फूलदान था। बीरबल बोला, “जहांपनाह, आपने देखा जिस विश्वास के साथ लोग अपनी मन्नत मांगते है  अवश्य ही पूरी होती है।” बादशाह खुश हो गये  और बीरबल को इनाम दिया।

 

 

 

 

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